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आध्यात्मिक कथा वाचक
आपके मार्गदर्शन हेतु अनुभवी और प्रेरक वक्ता LIVE : पंडित प्रदीप मिश्रा - Pandit Pradeep Mishra
पंडित प्रदीप मिश्रा जी (जन्म: 16 जून 1977) भारत के प्रसिद्ध आध्यात्मिक वक्ता, कथावाचक और शिव भक्त हैं। वे शिव महापुराण पर आधारित अपने सरल, भावपूर्ण और जनसामान्य को समझ आने वाले प्रवचनों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि पंडित प्रदीप मिश्रा जी का जन्म मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता श्री रमेश्वर दयाल मिश्रा आजीविका के लिए सड़क विक्रेता थे। सीमित साधनों के बावजूद परिवार में धार्मिक संस्कार और आध्यात्मिक वातावरण रहा। शिक्षा एवं प्रारंभिक रुचि उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सीहोर में ही प्राप्त की और स्नातक (Graduation) तक अध्ययन किया। बचपन से ही उनका झुकाव धर्म, भक्ति और शास्त्रों की ओर था, जिसने आगे चलकर उनके आध्यात्मिक जीवन की दिशा तय की। आध्यात्मिक दीक्षा एवं मार्गदर्शन पंडित प्रदीप मिश्रा जी को इंदौर में गोवर्धन नाथ जी से दीक्षा प्राप्त हुई। दीक्षा के पश्चात उन्होंने पुराणों, विशेषकर शिव महापुराण का गहन अध्ययन किया और शिव भक्ति को अपने जीवन का केंद्र बनाया। आजीविका से आध्यात्मिक सेवा तक उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक स्कूल शिक्षक के रूप में की। बाद में उन्होंने सांसारिक कार्य छोड़कर पूर्णकालिक रूप से धार्मिक प्रवचन और कथा वाचन को अपनाया। प्रारंभ में उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा कही, फिर पूरी तरह शिव महापुराण पर केंद्रित हो गए। कुबेरेश्वर धाम, सीहोर पंडित प्रदीप मिश्रा जी कुबेरेश्वर धाम, सीहोर के मुख्य पुजारी हैं। यह धाम आज शिव भक्तों के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक आस्था केंद्र बन चुका है, जहाँ शिव महापुराण कथा और रुद्राक्ष महोत्सव जैसे विशाल धार्मिक आयोजन होते हैं। “सीहोर वाले बाबा” के रूप में पहचान डिजिटल माध्यमों जैसे यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए वे देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान उनके प्रवचनों ने लाखों लोगों को आध्यात्मिक संबल और सकारात्मक दृष्टि प्रदान की, जिससे वे “सीहोर वाले बाबा” के नाम से लोकप्रिय हुए। सामाजिक एवं धार्मिक कार्य उन्होंने श्री विठ्ठलेश सेवा समिति की स्थापना की, जो कथा आयोजन, भंडारे, सेवा कार्य और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे सामाजिक-धार्मिक कार्यों में सक्रिय है। उनका उद्देश्य सेवा, संस्कृति और सनातन मूल्यों का संरक्षण है। सम्मान एवं उपलब्धियाँ वर्ष 2022 में, उनके एक आध्यात्मिक कार्यक्रम के लाइव प्रसारण को एकसाथ लाखों लोगों द्वारा देखे जाने के कारण उनका नाम वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड्स, लंदन में दर्ज किया गया। व्यक्तित्व एवं संदेश पंडित प्रदीप मिश्रा जी की पहचान उनकी सादगी, स्पष्ट वाणी और भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा से है। वे अपने प्रवचनों के माध्यम से अध्यात्म को जीवन से जोड़कर नैतिक मूल्यों, सकारात्मक सोच और सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का संदेश देते हैं।
LIVE : श्री देवकीनंदन ठाकुर - Shri Devkinandan Thakur
श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी – संक्षिप्त परिचय श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी भारत के सुप्रसिद्ध कथावाचक, आध्यात्मिक गुरु, मधुर संकीर्तन गायक और मानवसेवी संत हैं। वे श्रीमद्भागवत कथा और श्रीकृष्ण भक्ति के भावपूर्ण एवं प्रेरणादायक प्रवचनों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनकी वाणी में भक्ति, सकारात्मकता और ऐसा आत्मीय आकर्षण होता है, जो श्रोताओं को सहज ही आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ देता है। भक्तजन उन्हें प्रेमपूर्वक “ठाकुरजी” कहकर संबोधित करते हैं। आध्यात्मिक परंपरा एवं भक्ति मार्ग श्री देवकीनंदन ठाकुर जी निंबार्क संप्रदाय से संबद्ध एक जागृत संत हैं तथा श्री राधा अरविंदेश्वर के अनन्य भक्त हैं। उनका संपूर्ण जीवन सनातन धर्म, भक्ति मार्ग और सेवा भाव को समर्पित है। उनकी कथाओं और संकीर्तन में शास्त्रीय गहराई के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन के लिए उपयोगी आध्यात्मिक संदेशों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। अल्पायु में अद्भुत साधना और तपस्या केवल 13 वर्ष की अल्पायु में, अपने सद्गुरु के सान्निध्य और आशीर्वाद से, उन्होंने संपूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण को कंठस्थ कर लिया था। उस समय उनका साधना-अनुशासन अत्यंत कठोर था। वे प्रतिदिन तब तक न तो प्रातःकालीन भोजन करते थे और न ही दोपहर का, जब तक निर्धारित श्लोकों को पूर्ण रूप से स्मरण न कर लें। यही तपस्या, संयम और निष्ठा उनके आध्यात्मिक जीवन की मजबूत नींव बनी। संकीर्तन और कथा शैली की विशेषता श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी की संकीर्तन शैली अत्यंत मधुर, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी है। उनकी कथा-वाणी में भक्ति रस, सकारात्मक ऊर्जा और श्रोताओं को आत्मिक रूप से जोड़ लेने की अद्भुत क्षमता होती है। उनकी कथाएँ हर आयु वर्ग के लोगों को धर्म और भक्ति के मार्ग पर प्रेरित करती हैं। मानवसेवा और समाज के प्रति योगदान वे केवल एक महान वक्ता ही नहीं, बल्कि एक विनम्र मानवसेवी भी हैं। “विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट” के माध्यम से वे समाज सेवा, धर्म प्रचार और जनकल्याण के अनेक कार्यों में सक्रिय रूप से संलग्न रहते हैं। सेवा-भाव, सरलता और करुणा उनके व्यक्तित्व की प्रमुख पहचान है। जीवन का उद्देश्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी का मुख्य उद्देश्य लोगों को श्रीकृष्ण भक्ति से जोड़ना, सनातन धर्म के मूल्यों का प्रचार करना और समाज में आध्यात्मिक चेतना का जागरण करना है। उनकी साधना, सेवा और सादगी ही उन्हें जन-जन का प्रिय संत बनाती है।
LIVE : अनिरुद्ध चर्या - Shri Aniruddhacharya
पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज – संक्षिप्त परिचय पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज सनातन धर्म की ध्वजा को लेकर देश-विदेश में लाखों-करोड़ों लोगों को गौरी-गोपाल भगवान की भक्ति, सेवा, संस्कृति और संस्कारों से जोड़ने वाले एक प्रखर कथावाचक, आध्यात्मिक गुरु और समाजसेवी हैं। अपनी अमृतमयी वाणी, सरल शैली और गहन आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से वे लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य कर रहे हैं। आध्यात्मिक झुकाव एवं शिक्षा बचपन से ही पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी का झुकाव धर्म, शास्त्रों और भक्ति की ओर रहा। उन्होंने कम आयु में ही संस्कृत, वेद-पुराण और श्रीमद्भागवत का गहन अध्ययन किया। अपने गुरु श्री गिरिराज महाराज के मार्गदर्शन में उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया तथा भगवत आचार्य कोर्स पूर्ण कर वैदिक परंपरा को आत्मसात किया। उनका विश्वास शास्त्र वचन — “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया” — में गहराई से निहित है, जिसके अनुसार गुरु के सान्निध्य, सेवा और विनम्र जिज्ञासा से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। कथा शैली की विशेषता पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज श्रीमद्भागवत कथा के सरल, हास्यपूर्ण और व्यावहारिक प्रवचनों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। वे जीवन की सच्चाइयों, पारिवारिक संस्कारों, भक्ति और नैतिक मूल्यों को ऐसे सहज उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं कि सामान्य व्यक्ति भी धर्म के गूढ़ संदेशों को आसानी से समझ सके। यही कारण है कि युवा, बुज़ुर्ग और बच्चे सभी उनकी कथाओं से गहराई से जुड़ते हैं। समाज सेवा और मानव कल्याण अन्नपूर्णा रसोई पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज द्वारा 30 जून 2020 को अन्नपूर्णा रसोई की स्थापना की गई। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल है, जिसके माध्यम से प्रतिदिन लगभग 3000 से 5000 गरीब और असहाय लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस सेवा का उद्देश्य केवल भूख मिटाना नहीं, बल्कि समाज में करुणा, समानता और मानवता की भावना को सुदृढ़ करना है। अन्नपूर्णा रसोई उन लोगों के लिए आशा का केंद्र है, जिनके पास दो वक्त के भोजन का साधन नहीं होता। यह सेवा सामाजिक न्याय और मानव कल्याण की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम है। डिजिटल माध्यमों से धर्म प्रचार आज पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे डिजिटल मंचों के माध्यम से भी सनातन धर्म और भक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। उनके प्रवचन करोड़ों लोगों द्वारा देखे और सुने जाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ रही है। जीवन का उद्देश्य और प्रेरणा पूज्य श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज का मुख्य उद्देश्य समाज को सदाचार, भक्ति और सकारात्मक जीवन मूल्यों की ओर प्रेरित करना है। उनकी सादगी, स्पष्ट विचारधारा, सेवा-भाव और निष्काम भक्ति ही उन्हें जन-जन का प्रिय संत बनाती है।
प्रेमानंद जी महाराज - Premanand Ji Maharaj
परिचय श्री प्रेमानंद जी महाराज एक प्रसिद्ध भारतीय आध्यात्मिक गुरु, संत और भक्तिमार्ग के उच्च कोटि के प्रवक्ता हैं। वे राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़े रसिक संत हैं और राधा-कृष्ण प्रेम-भक्ति, नाम-स्मरण, ब्रह्मचर्य और सेवा को जीवन का मूल आधार मानते हैं। उनकी साधना, शिक्षाएँ और जीवन-शैली आज के समय में भक्ति मार्ग का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। माता-पिता एवं प्रारंभिक संस्कार श्री प्रेमानंद जी महाराज का जन्म एक संस्कारवान परिवार में माता श्रीमती रमा देवी और पिता श्री शंभू पांडे के घर हुआ। बाल्यकाल से ही उन्हें धार्मिक वातावरण, सादगी और नैतिक मूल्यों के संस्कार प्राप्त हुए। बचपन से उनका झुकाव ईश्वर-भक्ति, साधना और आत्मिक चिंतन की ओर था। संन्यास ग्रहण केवल 13 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने सांसारिक जीवन का परित्याग कर संन्यास मार्ग को अपनाया। यह निर्णय उनके भीतर विद्यमान गहरी वैराग्य भावना और ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा का परिचायक था। संन्यास पथ पर उन्हें प्रारंभ में आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी नाम प्राप्त हुआ तथा आगे चलकर महावाक्य और संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद वे स्वामी आनंदाश्रम कहलाए। साधना एवं तपस्वी जीवन श्री प्रेमानंद जी महाराज ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण काल वाराणसी में गंगा तट पर कठोर साधना में व्यतीत किया। वे लंबे समय तक एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान, मौन और आत्मचिंतन में लीन रहे। इसी अवधि में संत पंडित स्वामी श्री राम शर्मा जी के सान्निध्य ने उनके आध्यात्मिक मार्ग को और अधिक दृढ़ किया। गुरु परंपरा एवं दीक्षा उन्हें राधावल्लभ संप्रदाय के एक गोस्वामी द्वारा “शरणागति मंत्र” के माध्यम से दीक्षित किया गया। इसके पश्चात वे अपने परम गुरु श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज (बड़े गुरुजी) के सान्निध्य में पहुँचे। गुरुजी से उन्हें “निज मंत्र” की दीक्षा प्राप्त हुई, जो सहचरी भाव और नित्य विहार रस पर आधारित है। इसी के साथ वे रसिक संत परंपरा के आधिकारिक साधक बने। वृंदावन से विशेष आत्मिक संबंध श्री प्रेमानंद जी महाराज का वृंदावन से अत्यंत गहरा आत्मिक संबंध है। वे वृंदावन को केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की लीलाभूमि और साधना की पूर्ण स्थली मानते हैं। उनका विश्वास है कि वृंदावन में किया गया नाम-स्मरण और भक्ति साधना साधक के जीवन को शीघ्र आध्यात्मिक दिशा प्रदान करती है। श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट वर्ष 2016 में स्थापित श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट, वृंदावन एक गैर-लाभकारी संस्था है। ट्रस्ट का उद्देश्य भक्ति के साथ-साथ सेवा के माध्यम से समाज का उत्थान करना है। ट्रस्ट द्वारा प्रमुख सेवाएँ तीर्थयात्रियों हेतु आवास निःशुल्क भोजन व्यवस्था वस्त्र एवं आवश्यक सामग्री चिकित्सा सहायता साधु एवं निर्धन सेवा शिक्षाएँ एवं दर्शन श्री प्रेमानंद जी महाराज की शिक्षाओं के प्रमुख आधार हैं: हरिनाम जप और राधा-कृष्ण प्रेम-भक्ति आडंबर से दूर, अंतःशुद्धि पर बल गुरु-निष्ठा को आध्यात्मिक जीवन की रीढ़ मानना अहंकार, ईर्ष्या और दिखावे से दूर रहना ब्रह्मचर्य और संयम को आध्यात्मिक शक्ति मानना उनका स्पष्ट संदेश है: “ईश्वर को पाने का सबसे सरल और शुद्ध मार्ग प्रेम है, न कि केवल कर्मकांड।” ब्रह्मचर्य एवं संयम का व्यावहारिक दृष्टिकोण वे ब्रह्मचर्य को केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं मानते। उनके अनुसार गृहस्थ जीवन में भी इंद्रिय संयम विचारों की पवित्रता अनुशासित दिनचर्या आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। मौन, एकांत और सादगी श्री प्रेमानंद जी महाराज का जीवन अत्यंत सादा, मौनप्रिय और एकांत साधनामय रहा है। वे मंचीय दिखावे, अनावश्यक प्रसिद्धि, विवादों और राजनीति से सदैव दूर रहते हैं। युवाओं के लिए संदेश युवाओं को वे विशेष रूप से प्रेरित करते हैं कि: जीवन को लक्ष्यहीन न बनाएं नशा, भोग और मोबाइल-आसक्ति से बचें कम उम्र से नाम-स्मरण और सदाचार अपनाएँ ऊर्जा को साधना और सेवा में लगाएँ
देवी चित्रलेखा - Shri Devi Chitralekha
संक्षिप्त परिचय देवी चित्रलेखा जी भारत की प्रसिद्ध युवा कथावाचिका और आध्यात्मिक वक्ता हैं। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा और भक्ति मार्ग के माध्यम से देश-विदेश में लाखों भक्तों को प्रभु भक्ति से जोड़ा और व्यापक श्रद्धा प्राप्त की। पारिवारिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि देवी चित्रलेखा जी एक संस्कारवान ब्राह्मण परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता, श्री टीकाराम शर्मा और श्रीमती चमेली देवी, उन्हें बचपन से ही धर्म, भक्ति और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देते रहे। दादा-दादी से उन्हें गहरे आध्यात्मिक संस्कार विरासत में मिले, और ब्रज क्षेत्र की दिव्य संस्कृति ने उनके व्यक्तित्व को प्रारंभ से ही आध्यात्मिक दिशा दी। उनका एक भाई प्रत्यक्ष शर्मा है। दीक्षा और प्रारंभिक प्रवचन केवल 4 वर्ष की आयु में उन्हें गौड़ीय वैष्णव परंपरा में दीक्षा प्राप्त हुई। 6 वर्ष की उम्र में बरसाना में दिया गया उनका पहला सार्वजनिक प्रवचन सभी को मंत्रमुग्ध कर गया। इसके बाद वृंदावन के समीप तपोवन में उनकी पहली 7 दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सफलतापूर्वक संपन्न हुई, जिसने उनके कथा जीवन की मजबूत नींव रखी। विशेष प्रतिभा और शिक्षा देवी चित्रलेखा जी ने औपचारिक रूप से कहीं से कथा या संगीत का प्रशिक्षण नहीं लिया, फिर भी वे कथा वाचन, भजन गायन और हारमोनियम वादन में अद्भुत निपुणता रखती हैं। वे शिक्षा के महत्व को भी समझती हैं और उन्होंने सामान्य पब्लिक स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान के बीच संतुलन बनाए रखा। विवाह और पारिवारिक जीवन 23 मई 2017 को देवी चित्रलेखा जी का विवाह माधव प्रभु जी (माधव तिवारी) से हरियाणा के पलवल में संपन्न हुआ। माधव प्रभु जी मूल रूप से बिलासपुर, छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और आध्यात्मिकता में गहरी आस्था रखते हैं। यह दंपति मिलकर समाज और धर्म सेवा में सक्रिय योगदान दे रहा है। सेवा कार्य और जीवन उद्देश्य देवी चित्रलेखा जी ने गौ सेवा धाम की स्थापना कर बीमार और घायल गायों की सेवा का कार्य प्रारंभ किया। इसके साथ-साथ वे संकीर्तन यात्राओं के माध्यम से भारत सहित अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और अफ्रीका जैसे देशों में भी भक्ति कार्यक्रम आयोजित करती हैं। उनका जीवन उद्देश्य राधा-कृष्ण भक्ति और हरे कृष्ण महामंत्र को पूरे विश्व में फैलाना है, जिसे वे गुरु आज्ञा के अनुसार पूर्ण समर्पण भाव से निभा रही हैं।
धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री - Dheerendra Krishna Shastri
करीब 300 साल पहले जिस मानव कल्याण और जनसेवा की परंपरा को सन्यासी बाबा ने शुरु किया था, अब इसी परंपरा को और आगे बढ़ा रहे हैं बालाजी महाराज के कृपा पात्र, श्री दादा गुरुजी महाराज के उत्तराधिकारी पूज्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री, जिसे पूरी दुनिया बागेश्वर धाम सरकार के नाम से संबोधत करती है। भक्तों का कष्ट हरने भगवान खुद इस धरती पर नहीं विराजते बल्कि अपने किसी दूत को भेजते हैं। बागेश्वर धाम सरकार, बालाजी के वो भक्त हैं जिनपर उनकी असीम कृपा है। यहां जो भी बालाजी महाराज की शरण में अपनी मनोकामना लेकर आता है, बालाजी महाराज अपने परम भक्त बागेश्वर धाम सरकार के माध्यम से उसे पूर्ण करवाते हैं। बालाजी महाराज के आशीर्वाद से महाराज श्री बागेश्वर धाम सरकार की ख्याति की गवाही तो उनकी कथाओं और उनके दरबारों में श्रद्धालुओं भारी भीड़ देती है। महाराज श्री के दर्शन और उनकी एक झलक पाने के लिए ना जाने कहां कहां से श्रद्धालुगण देशभर में हो रही इनकी कथाओं में पहुंचते हैं और उनकी दिव्यवाणी का श्रवण करते हैं। 4 जुलाई 1996 को मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के ग्राम गढ़ा में सरयूपारीय ब्रह्मण परिवार में पिता श्री रामकृपाल जी महाराज और भक्तिमति माता सरोज के परिवार में जन्मे पूज्य गुरुदेव का बचपन गरीबी और तंगहाली में बीता। कर्मकांडी ब्राह्ण का परिवार था, तो पूजा पाठ में जो दक्षिणा मिल जाती उसी से 5 लोगों का परिवार चलता। ऐसे में पूज्य महाराज श्री को अपनी शिक्षा भी अधुरी छोड़नी पड़ी। तीन भाई-बहन में सबसे बड़े गुरुदेव का पूरा बचपन अपने परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था करने में ही गुज़र गया। लेकिन एक दिन बालाजी महाराज की आज्ञा और कृपा से उन्हें उनके दादा जी श्री श्री 1008 दादा गुरु जी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ और दादा गुरु के आशिर्वाद और आदेश से महाराज श्री बालाजी महाराज की सेवा में जुट गए। सन्यासी बाबा और इस धाम की महिमा को दुनिया भर में फैलाया और आज इसका नतीजा है धाम पर हर मंगलवार और शनिवार को पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालुओं की भीड़। जनकल्याण और समाज कल्याण के कार्यों के क्रम में जिस तरह से मानव जाति का कल्याण होता आया है, इसके लिए युगों युगों तक गुरुदेव के संकल्प और उनकी कीर्ति याद रखी जाएगी। अपने लिए ना जी कर दूसरों के लिए जीये, दूसरों के लिए कुछ करने के संकल्प के साथ अपना पूरा समय मानवता की सेवा में दे, ऐसे महापुरुष संत को बारम बार नमन…
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दिव्य नाम संग्रह
भगवान के पवित्र नामों का संग्रह
मेरे मन में राधे - Mere Mann Mein Radhe
परिचय यह एक अत्यंत मधुर और प्रेमभाव से ओत-प्रोत राधा भजन है, जिसमें भक्त अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में श्री राधा रानी की उपस्थिति का अनुभव करता है। इस भजन में राधा नाम की महिमा, प्रेम की गहराई और भक्ति की सरलता का सुंदर संगम देखने को मिलता है। भजन में यह दर्शाया गया है कि राधा केवल एक नाम नहीं, बल्कि जीवन की हर अनुभूति—श्वास, धड़कन, प्रेम और विश्वास—का आधार हैं। भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव श्री राधा रानी के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम को व्यक्त करना है। भक्त यह मानता है कि उसके जीवन की हर शुरुआत और हर अंत राधा नाम से ही जुड़ा हुआ है। भजन यह सिखाता है कि जब हृदय में सच्चा प्रेम और श्रद्धा होती है, तब भगवान हर क्षण, हर कण में अनुभव होते हैं। राधा नाम का स्मरण जीवन को आनंद, शांति और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है।
सीता सीता सीता सीता राम गाइये - Sita Sita Sita Sita Ram Gaiye
परिचय यह अत्यंत मधुर, सरल और हृदय को भक्ति रस से भर देने वाला भजन भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के पावन नाम-स्मरण की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। भजन में “सीता राम” और “राधे श्याम” नामों का बार-बार उच्चारण करके भक्तों को यह संदेश दिया गया है कि कलियुग में प्रभु का नाम ही सबसे बड़ा सहारा, सबसे बड़ी शक्ति और सबसे सरल साधना है। इस भजन के माध्यम से यह बताया गया है कि संसार में सब कुछ नश्वर और परिवर्तनशील है। जीवन कब बदल जाए, कौन अपना रहे और कौन पराया हो जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। ऐसे समय में केवल भगवान का नाम ही मनुष्य को स्थिरता, शांति और आत्मिक सुख प्रदान करता है। “सीता राम” और “राधे श्याम” का संकीर्तन केवल भक्ति नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का दिव्य मार्ग है। भजन के शब्द अत्यंत सहज हैं, लेकिन इनके भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है। यह भजन मनुष्य को सांसारिक चिंताओं से हटाकर प्रभु प्रेम की ओर ले जाता है और जीवन में श्रद्धा, प्रेम, संतोष तथा सकारात्मकता भर देता है। जब भक्त पूरे मन से प्रभु का नाम गाता है, तब उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है और उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव होने लगता है। भावार्थ इस भजन में भक्त सभी लोगों को प्रेम और श्रद्धा के साथ भगवान श्रीराम और राधे-श्याम का नाम जपने की प्रेरणा देता है। वह समझाता है कि यह संसार क्षणभंगुर है और यहाँ किसी भी वस्तु, संबंध या सुख का स्थायी अस्तित्व नहीं है। मनुष्य जीवन में कभी सुख आता है तो कभी दुःख, कभी अपने साथ देते हैं तो कभी साथ छोड़ देते हैं। इसलिए केवल सांसारिक मोह-माया पर भरोसा करने के बजाय प्रभु के नाम का आश्रय लेना चाहिए। भजन में यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने अंतरमन से भगवान का सच्चे भाव से स्मरण करे और अपने जीवन को प्रेम रूपी अमृत से भर ले, तो उसका जीवन धीरे-धीरे बदलने लगता है। प्रभु का नाम मन को शांति देता है, दुखों को कम करता है और आत्मा को आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है। “धीरे-धीरे राम जी का साथ पाइये” पंक्ति का अर्थ है कि भक्ति का मार्ग धैर्य, प्रेम और निरंतर स्मरण का मार्ग है। जो भक्त नियमित रूप से प्रभु का नाम जपता है, उसके जीवन में ईश्वर की कृपा स्वतः प्रकट होने लगती है। अंततः यह भजन यही संदेश देता है कि भगवान का नाम ही जीवन का सच्चा धन, सच्चा सहारा और परम आनंद का स्रोत है।
श्याम जो करेंगे अच्छा करेंगे - Shyam Jo Karenge Acha Karenge
परिचय यह भजन भगवान श्याम के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का संदेश देता है। इसमें बताया गया है कि इस संसार में किसी भी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हर एक सांस और हर एक परिस्थिति प्रभु के अधीन है। भजन यह दर्शाता है कि भगवान ही सृष्टि के रचनाकार हैं और वही हमारे जीवन का संचालन करते हैं। जब भक्त यह विश्वास अपने मन में स्थापित कर लेता है, तो उसके जीवन से भय और चिंता स्वतः समाप्त हो जाते हैं। भावार्थ इस भजन के माध्यम से यह समझाया गया है कि संसार का मोह और संबंध क्षणिक हैं, जबकि भगवान का साथ सदा के लिए होता है। केवल प्रभु ही हमारे मन की पीड़ा को सही मायने में समझ सकते हैं और हर संकट में हमारी रक्षा करते हैं। यदि हम सच्चे मन से भगवान पर विश्वास रखें, तो वह हमारे जीवन में जो भी करेंगे, वह हमारे लिए सर्वोत्तम होगा। यह भजन हमें यह सिखाता है कि हमें हर परिस्थिति में भगवान की इच्छा को स्वीकार करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए, क्योंकि अंततः वही हमारे जीवन को सुंदर और सफल बनाते हैं।
छम छम बाजे पायलिया छवि दिखलाए कान्हा - Cham Cham Baje Payaliya Chavi Dikhalye Kanha
परिचय यह अत्यंत मधुर और वात्सल्य रस से भरा श्रीकृष्ण भजन भगवान श्रीकृष्ण के घर आगमन की आनंदमयी भावना को व्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अपने घर आए बाल गोपाल की मनमोहक छवि का वर्णन करता है। श्रीकृष्ण की पायल की मधुर ध्वनि, उनकी सांवली सूरत और मोहक मुस्कान पूरे वातावरण को प्रेम और आनंद से भर देती है। भजन में माता यशोदा, सखियों और भक्तों के हृदय में उत्पन्न होने वाले आनंद का सुंदर चित्रण किया गया है। कान्हा के आगमन से अंधेरी रात भी प्रकाशमय हो जाती है और हर कोई उनकी मोहिनी छवि में खो जाता है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के प्रेम, वात्सल्य और आत्मिक आनंद की मधुर अनुभूति कराता है। इसे सुनकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं बालकृष्ण भक्त के घर पधार गए हों। भावार्थ इस भजन में भक्त अत्यंत प्रसन्न होकर कहता है कि भगवान श्रीकृष्ण उसके घर पधारे हैं। उनकी पायल की मधुर ध्वनि और सुंदर छवि देखकर पूरा वातावरण आनंद से भर गया है। भक्त अनुभव करता है कि श्रीकृष्ण के आगमन से अंधकार मिट जाता है और जीवन पवित्र हो जाता है। माता यशोदा और सखियाँ भी कान्हा की मोहक अदाओं को देखकर आनंदित हो जाती हैं। भजन यह संदेश देता है कि जब भगवान भक्त के हृदय में आते हैं, तब जीवन प्रेम, शांति और दिव्य आनंद से भर जाता है। श्रीकृष्ण का दर्शन और स्मरण ही भक्त के जीवन को पावन बना देता है।
कान्हा तेरी बांसुरी नींद चुराए - Kanha Teri Basuri Nind Churaye
परिचय यह अत्यंत मधुर और विरह रस से परिपूर्ण श्रीकृष्ण भजन भक्त के हृदय में बसे कान्हा के प्रेम और उनकी बांसुरी की मोहिनी धुन का भावपूर्ण वर्णन करता है। इस भजन में भक्त कहता है कि श्रीकृष्ण की बांसुरी ने उसकी नींद और चैन दोनों चुरा लिए हैं और अब उसका मन केवल कान्हा के प्रेम में डूबा रहता है। भजन में प्रेम, विरह और समर्पण की गहरी भावना दिखाई देती है। भक्त संसार से छिपकर अपने हृदय की व्यथा व्यक्त करता है और कहता है कि श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना उसका जीवन अधूरा प्रतीत होता है। कान्हा की मधुर बांसुरी उसके मन को बार-बार उनकी ओर आकर्षित करती है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के उस दिव्य प्रेम को दर्शाता है जहाँ विरह भी भक्ति का मधुर स्वरूप बन जाता है। भावार्थ इस भजन में भक्त श्रीकृष्ण से कहता है कि उनकी बांसुरी की मधुर धुन ने उसका चैन और नींद छीन ली है। अब उसका मन हर समय केवल कान्हा के स्मरण और प्रेम में डूबा रहता है। भक्त अपने प्रेम को अत्यंत पवित्र मानते हुए डरता है कि कहीं उसकी प्रेम डोरी टूट न जाए। वह कान्हा के दर्शन की अभिलाषा में व्याकुल होकर आँसू बहाता है और उनके बिना जीवन को अधूरा अनुभव करता है। भजन यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति में प्रेम इतना गहरा हो जाता है कि भक्त का मन संसार से हटकर केवल भगवान में ही रम जाता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी यहाँ दिव्य प्रेम और आत्मिक आकर्षण का प्रतीक है।
आदेश अलख निरंजन - Aadesh Alakh Niranjan
परिचय यह भजन नाथ संप्रदाय की आध्यात्मिक परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और योग साधना की गहन शिक्षाओं का सुंदर वर्णन करता है। भजन में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ, गुरु गोरखनाथ, नव नाथ, भगवान शिव, हनुमान जी तथा माँ अन्नपूर्णा की महिमा का गुणगान किया गया है। इसमें “अलख निरंजन” और “आदेश” जैसे नाथ पंथ के प्रमुख आध्यात्मिक मंत्रों के माध्यम से साधक को बाहरी संसार से ऊपर उठकर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होने का संदेश दिया गया है। यह रचना केवल भक्ति गीत नहीं बल्कि वैराग्य, योग, गुरु कृपा और आत्मबोध का आध्यात्मिक संदेश भी प्रदान करती है। भजन में यह बताया गया है कि सच्चा योगी देह, नाम, अहंकार और सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर परम सत्य का अनुभव करता है। नाथ परंपरा में गुरु को ब्रह्म स्वरूप माना जाता है और इसी भावना को यह भजन अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। भावार्थ इस भजन का मुख्य भाव यह है कि गुरु की कृपा और योग साधना के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के समस्त भय, क्लेश, मोह और कर्मबंधन से मुक्त हो सकता है। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ को ज्ञान, वैराग्य और आत्मजागरण का प्रतीक बताते हुए भजन यह संदेश देता है कि सच्चा मार्ग भीतर की चेतना को पहचानने में है। “अलख निरंजन” का अर्थ उस परम सत्य से है जो निराकार, अनंत और अविनाशी है तथा प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। भजन में यह भी बताया गया है कि जब साधक गुरु के आदेश का पालन करता है और आत्मचिंतन के मार्ग पर चलता है, तब उसके भीतर का अज्ञान नष्ट होने लगता है। नव नाथों की कृपा, हनुमान जी की शक्ति और भगवान शिव की साधना से जीवन के भय, रोग, शोक और बाधाएँ दूर होती हैं। अंततः साधक यह अनुभव करता है कि परमात्मा बाहर नहीं बल्कि उसके अपने हृदय और चेतना में ही विद्यमान हैं। यही आत्मज्ञान नाथ परंपरा का मूल संदेश है।
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